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Saapharee

(Saapharee Part 1)


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By Yugal Joshi






Copyright 2017 Yugal Joshi


Smashwords Edition







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साफरी


तीनों लोकों को जब,

ग्रस लेता है, अंधियारा

खोल नहीं पता जब यह लोक,

अज्ञान से चिपचिपे नयन

तब, हे सूर्य , हमारे देव

तुम बन जाते हो द्राक्षा।

तुम्हारी प्रकाशित बाहें फैलते ही,

असंख्य सुषुप्त कलिकाएँ हो जातीं हैं चेतन।



हाड़ जमा देने वाली उस ठंड में, आसन्न मृत्यु के बीच भी, मुझे वह गुफ़ा भयानक लगी थी। आपदा के मारे इंसान की वह शरणस्थली पत्थरों और कीचड़ से भरी थी। गुफ़ा में रची बसी दुर्गन्ध मेरे चेतन को शिथिल कर रही थी तो बाहर भाँय भाँय करता तूफ़ान मेरी शक्ति को। प्रलयंकारी पवन मेरी जिजीविषा पर घात पर घात किए जा रहा था। अंधेरे व्याघ्र पर सवार आतंकित करता मेह मेरी जीवनदायिनी साँसे घोंट लेने को आमादा था।


सैकड़ों फ़ीट नीचे से सुनायी देता क्रोधित गंगा का कोलाहल मेरी सोचने की सामर्थ्य छीन चुका था। घटाटोप अँधियारे में नदी के प्रवाह सी बरसती धार अभी थमी नहीं थी। बड़ी बड़ी चट्टानों और पत्थरों का छपाक से नदी में गिरना जारी था। छपाक की भीषण ध्वनि मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसकाती जाती थी।


बस, प्रहर भर पहले ही तो मृत्यु ने अपना नर्तन आरम्भ किया था। गंगा के पहले पद संचलन भर से, मेरे मित्र, सैकड़ों पर्यटक, तीर्थयात्री और स्थानीय लोग, आपस्मार दैत्य की भाँति तांडव करते मृत्यु देव के दाहिने पैर के नीचे दाबे जा चुके थे। प्रकृति के एक क्रूर अट्टहास भर ने सहसा ही, पलक झपकने से पूर्व, सड़कों, बस्तियों और पहाड़ियों को मिटा दिया था।


तब जब घनघोर वर्षा के साथ सब कुछ घाटी की ओर आता जा रहा था, चेतनरहित मैं, चोटियों की तरफ़ भाग रहा था। जीवन संजीवनी के दाता मेरे पहाड़, पहली बार मुझे अजनबी और आक्रांता लगे थे। हर पहाड़ी, सुरसा सा मुँह खोले मुझे लीलने को आतुर दिखती थी।


मेरे चारों ओर, विशाल शिलाखंड, वृक्ष, पत्थर, मिट्टी और पानी सभी ह्रिंस होकर नीचे की ओर दौड़ रहे थे, सर्वग्रासी और जंगली नदी से मिल-मिटने को आतुर। जहाँ पहले हरी-भरी संजीवनी घाटी थी, अब वहाँ मटमैले भँवरों वाली नदी का विस्तार था। नदी जो, सुंदर या असुंदर, जीवित या मृत सबके सर्वनाश के लिए उत्सुक थी।


जीवन के हर अंश का यह अंतिम और पूर्ण समापन था। शिव की जटाओं से सहसा गंगा ने स्वयं को स्वेच्छाचारी कर लिया था। वह उस प्रत्येक वस्तु के विनाश को प्रेरित थी, जिसके जीवन के लिए वह भगीरथ के तप से, शिव की जटाओं में अनुशासनबद्ध कर दी गयी थी। प्रकृति के सबसे आदिम तत्व द्वारा यह प्रकृति का अंत था। “ईश्वर, क्या यह सृष्टि का अंत है? क्या यही है, प्रलय?”


और मैं, मूर्खता भरे दुस्साहस से, चोटी की ओर दौड़ रहा था। नीचे आ रहे पत्थरों और चट्टानों से, अविश्वसनीय रूप से बचता हुआ। रूद्र को मैंने रोता देखा। कहते हैं, जब उषा और ईश्वर प्रणय बंधन में बंधे तो उनका एक पुत्र उत्पन्न हुआ। नवजात शिशु के रुदन पर पिता ने प्रश्न किया, ‘इतने परिश्रम और सत्व से उत्पन्न, ईश्वर का पुत्र, तू क्यों रोया?’ पुत्र ने उत्तर दिया, ‘तात, मेरा तमस अब तक दूर नहीं हुआ है। आपने मुझे कोई नाम नहीं दिया।’ तब ईश्वर ने कहा, ‘पुत्र, क्योंकि तू रोया, इसीलिए तू रूद्र कहलाएगा।’


काँपते हृदय से मैंने साक्षात काल का रूप लिए रूद्र को देखा। काल भैरव का रुदन जारी था। सृष्टि को लीलने के लिए रूद्र के प्रच्छ्वासों से घनघोर घटाएँ बन रहीं थीं। प्रलयंकारी गरजन करते, विशाल आकर के काले बादलों से आकाश ढका था। मनुष्य के पापों से शस्य-श्यामला धरती सूखी पपड़ी सी बन के रह गयी थी और अब आग में जल रही थी। इस नारकीय आग को बुझाने के लिए कृतसंकल्प रूद्र ने अपने आसुओं को बहाना आरम्भ कर दिया था। पासों से भी बड़े आकार की बूँदों की झड़ी निरंतर जारी थी। इस गहनतम अंधकार में, वर्षा जड़ और चेतन सभी को, न्याय अन्याय का विचार किए बिना, मिटाने को उद्धत थी।


जान बचाने को भागते आतंकित खच्चर की तरह मेरी दौड़ जारी थी। तभी, एक पत्थर तेज़ी से मेरी बायीं टाँग पर आकर लगा। असहनीय दर्द से सन्न मेरा शरीर तेज़ी से घाटी की ओर गिरने लगा। कीचड़, पत्थरों और पानी के साथ बहता मैं, अब तक समुद्र का रूप ले चुकी क्रुद्ध गंगा से मिलने ही वाला था।


मृत्यु सन्निकट थी। यम के दोनों अतृप्त कुत्तों को मैं स्पष्ट देख पा रहा था। फूले हुए नथुनों और चार आँखों वाले वह श्वान बहुत ही भयावह थे।


मृत आत्माओं को सलाह दी जाती है कि वह इस पथ को यथाशीघ्र पार करें, जिस पथ की निगरानी ये श्वान करते हैं।’ बचपन में सुने गए ये शब्द मेरे कानों में बजने लगे थे।


क्या मैं मरने वाला हूँ?” बस इस सोच ने मेरी शक्ति हर ली।


हर चिरपरिचित को पाओगे वहाँ

जो था प्रियतम तुम्हें यहाँ

जननी, जनक, भार्या और संतानें

सभी प्रियजन होंगे शीघ्र आलिंगनबद्ध।


तुम्हारे प्रिय पालक पिता

वीरगति को प्राप्त सभी सेनानी

आभामंडित सभी साधु और संत

सच्चरित्र और सभी चक्रवर्तिन…


श्लोक ज्यों ही मेरे कानों में बजा,मुझे स्मरण हो आया कि, कोई भी तो मेरा अपना वहाँ नहीं है। माता-पिता, बंधु, पत्नी, संतानें और मित्र, सभी तो इसी मर्त्यलोक में हैं। और, इस आशा में हैं, कि मैं यात्रा पूरी करके शीघ्र उनके पास वापस लौटूँगा। साक्ष्यात्कार के उस क्षण में मैं मर्मांतक आवाज़ चीख़ पड़ा। शायद ग्राह से मुक्त होने को छटपटाते गजराज की तरह।

तभी कुछ घटित हुआ। मेरी गति यकायक थम गयी। जलधारा, मिट्टी और पत्थरों के साथ अब मेरे साथ न बहकर मेरे ऊपर से बह रही थी। मैं स्थिर था, दो शिलाओं के मध्य फँस कर।


वर्षा निरंतर जारी थी। कुछ देर बाद मेरी प्राणदायिनी शिला भी विचलित होने लगी। अस्तित्व के सम्पूर्ण साहस को बटोरकर, मैं उठा। कुछ क़दम दूर एक संकरा मार्ग सा था। पहाड़ पर जमीं घास को पकड़ता मैं उस ओर रेंगने लगा।


हर अगले क़दम के साथ हज़ारों तारिकाएँ मेरी आँखों के सामने नाचने लगतीं थीं। क्षत-विक्षत शरीर और टूटी टाँग के साथ मैंने प्रतिपल बढ़ते जल प्रवाह को देखा और फिर देखा अथक बरसते मेघों को।


जलौघमग्ना सचराचारा धरा

विषाणकोट्याअखिलविश्वमूर्तिमना;

समुदध्रता येन वराहरूपिना

स में स्वयंभुर्भगवान प्रसीदतु ।


उस अथाह जलराशि में मुझे विशाल वराह की छाया दिखी। साहस बटोरते हुए मैंने सम्भालकर क़दम बढ़ाए। “हे महावराह, जैसे तुमने पृथ्वी को सम्हाला, वैसे ही मुझे भी सम्हालो।” इस मंत्र को बारम्बार जपता मैं, उस फिसलन भरे, संकरे और दुरूह मार्ग पर बढ़ता चला गया।


लगभग चौपाया सा बना मैं चढ़ रहा था। कोई और मार्ग या सहारा न था। पहले दाहिना पैर बढा कर मज़बूती से घास पकड़ता था, फिर बाएँ घुटने को खींचकर आगे लाता। अँधेरा भी घिरने लगा था। क्या पथ, क्या लक्ष्य सब दिखना बंद हो गया था।


तब मुझे याद आया, प्रभु का वामन अवतार। भगवान के उस ठिगने ब्राह्मण अवतार ने तीन क़दमों में ही अखिल ब्रह्मांड नाप दिया था। “प्रभु मेरे पग वामन के पग बना दो। एक क़दम से पृथ्वी और दूसरे से आकाश नापकर जैसे तूने दैत्यों से लोक पुनः प्राप्त किए, वही पग मुझे भी दे, भगवन।”


प्रभु, प्रभु करता मैं भी एक एक क़दम नापने लगा। घिसटता हुआ और गिनता हुआ, एक, दो…एक, दो…


परिस्थिति, दूरी और समय से परे, न जाने कितने काल तक मैं अपने क़दम नापता गया। पौराणिक चरित्रों और अवतारों को स्मरण और पुनः स्मरण करता हुआ। जब तक कि मैंने पाया कि मैं एक गुफ़ा के मुहाने पर खड़ा हूँ।


मौत की उस अँधियारी रात्रि में, एक आतंकित मन और अंतिम अनिष्ट की आशंका को सुनने के आतुर कानों के अतिरिक्त मेरा कोई अस्तित्व नहीं बचा था। हर ध्वनि मुझे अंतिम ध्वनि प्रतीत होती थी। ऐसा लगता था कि जैसे मेरे चारों ओर से ज़मीन दरक रही है। और कालरात्रि के उस भयावह अंधकार में, हल-हल करता जल प्रतिक्षण मुझे घेर रहा है।


उजाले की बस एक किरण भर…” कैसे प्रकाश की एक झलक भर के लिए मैं तरस गया था। “सूर्य, हे पिता, जीवन के जनक, कैसे हम तुम्हें टेकन फ़ॉर ग्रांटेड ले लेते हैं?”


उस रात्रि मैंने पहली बार , जीवन में पहली बार, सूर्य का आह्वाहन किया। सूर्य, जो सृजक है, जो हमारा पिता है। तब मैंने जाना, क्यों हमारी सारी कथाएँ सूर्य अथवा सूर्य-पुत्रों से प्रारम्भ होतीं हैं। और क्यों हमारी सबसे अमर कथा, सूर्यवंश की कथा है, राम की कथा है।


उस रात, जब मैं मान चुका था कि देर सेबर अपने साथियों की तरह मैं भी गंगा द्वारा लील लिया जाऊँगा, मुझे मनु की कथा याद आयी थी। मनु भी तो सूर्य पुत्र हैं। मनु निमित्त बने थे, ईश्वर के पहले अवतार का। जब जल प्रलय से सृष्टि और वेद दोनों ही संकट में आ गए थे।


पौराणिक काल में मनु नाम के एक सच्चरित्र व्यक्ति थे। रोज़ प्रातः कमर तक जल में खड़े होकर वह सूर्य को अर्घ्य देते थे। एक दिन, अर्घ्य देते समय उनकी अँजुरी में एक नन्ही सी मछली आ गयी। माथे पर एक नन्हा सा सींग उगाए उस विचित्र मछली की आँखों में याचना थी और अधरों में प्रार्थना, ‘हे मनुष्य, मुझे बड़ी मछलियों से बचा लो।’


दयालु मनु ने उस मछली को बचा लिया और एक छोटे से पात्र में रख लिया। मछली दिन पर दिन अपना आकार बढ़ाती गयी और मनु उसके पात्र का आकार बढ़ाते गए। परंतु एक दिन, मछली इतनी बड़ी हो गयी कि मनु के सभी पात्र छोटे पड़ गए। तब मनु मछली को एक तलैय्या में छोड़ आए। पर कुछ रोज़ में वह तलैय्या से भी बड़ी हो गयी। मनु ने अब उसे एक बड़े तालाब में छोड़ दिया। पर मछली का आकार बढ़ता ही जाता था। तब मनु ने उसे एक झील में छोड़ दिया। पर जब मछली झील में भी न समायी तो मनु को उसे गंगा नदी में छोड़ना पड़ा।


समय बीता और मनु उस मछली को भूल गए। उसके बाद कई महीने बीतने पर, एक दिन आकाश में घने बादल घिर आए। मूसलाधार वर्षा आरम्भ हो गयी। घंटे, दिन और सप्ताह बीते पर वर्षा ने थमने का नाम नहीं लिया। तलैय्या, तालाब, झील, नदियाँ और समुद्र , सब पानी से लबालब भर गए। जल्दी ही पानी ने ज़मीन को डुबोना शुरू कर दिया। ऐसा लगा, पृथ्वी शीघ्र ही जलमग्न हो जाएगी। मनु ने तब एक लकड़ी की बड़ी नौका बनायी। एक मज़बूत बक्से में वेदों को बंद कर वह बक्से के साथ नाव में बैठ गए। विरासत और संस्कृति को बचाना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण था।


नौका चल पड़ी। पर जल का कोई पारावार नहीं था। और जल था कि बढ़ता चला जाता था। नाव उत्ताल जल की तरंगों में डूबने उतराने लगी। हर तरफ़ जल ही जल था। नाव में वेदों के साथ सवार मनु असहाय हो गए। तब, शरीर और ज्ञान की मृत्यु की आशंका से भयभीत, मनु ने ईश्वर को पुकारा।


एक चमत्कार हुआ। माथे पर सींग उगाए एक मछली मनु की नाव के पास प्रकट हुयी। प्रत्युतपन्नमति मनु ने तुरंत ही एक रस्सी से अपनी नाव को उस मछली के सींग से बाँध दिया। मछली नाव में बैठे मनु को निर्देशित करती चली और ले गयी उत्तर के ऊँचे पर्वत शिखरों की ओर। मनु और मछली तब तक वहाँ रुके रहे जब तक कि जलस्तर गिर नहीं गया।


दर्द से बहाल, बेहोशी में डूबते-तिरते मुझको जब होश आया तो सूर्य की रौशनी गुफ़ा के भीतर तक आ चुकी थी।


क्या मैं नरक से वापस आ गया ?” आशा और आशंका के साथ मैं गुफ़ा से बाहर निकला। रात ढल चुकी थी। हल्की सी रौशनी हर तरफ़ फैली थी पर घनघोर वर्षा अब भी जारी थी। गुफ़ा के मुहाने से ही मैंने देखा, सब तरफ़ खाई ही खाई थी और नीचे था जलराशि का अनंत विस्तार। चारों ओर विनाश ही विनाश का दृश्य था। भूस्खलन से नग्न हो चुके दरिद्र पर्वत अपनी विवशता पर रो रहे थे। बचने का हर मार्ग जल-प्लावित था। चोटी पर फँसे मुझको अब बस यम की प्रतीक्षा शेष थी।


बहुत देर बाद मेरा ध्यान पीठ पर लदे, गीले और भारी हो चुके बैग पर गया। बहुत प्रयास करने के बाद मैं बैग को उतार पाया। दो डायरियाँ, बाल पेन, एक टूटा मोबाइल फ़ोन, चार सेव , गीले बिस्किट, चौकलेट , और पानी की एक बोतल, बैग से निकली।


मुझे मनु फिर याद आए। वह पवित्र वेदों को बचाना चाहते थे। पर मृत्यु द्वार पर खड़ा मैं क्या बचाना चाहता हूँ? मानवता के लिए कुछ छोड़ पाने की मेरी हैसियत नहीं, जीवन में कुछ सार्थक कभी किया नहीं। कुछ अपने बच्चों के लिए? पर क्या, कुछ भी तो मेरे पास नहीं?


सारा दिन मेह बरसता रहा। मैं सोचता रहा। कोई भी तो ऐसी उपलब्धि नहीं, जिसका बखान कर सकूँ। कोई भी ऐसा कर्म नहीं, पोतों को सुना सकूँ। जीवन यूँ ही गुज़र गया, कहीं कोई क़िस्सा -कहानी नहीं। अपनी विवशता बयान करने के अलावा क्या है, आज मेरे पास? ऐसे ही सोचों में दिन बीत गया और फिर रात घिर आयी। काले बादलों का गर्जन-तर्जन जारी था, और जारी थी मृत्यु-दूत सरीखी वर्षा। सारी रात पुराण और नूतन चित्र मेरे सपनों में आते जाते रहे। मन और तन से टूटा मैं गुफ़ा के भीतर पड़ा रहा।


सुबह होते होते सिर दर्द से फटने लगा था। उठने की कोशिश की तो सिर चकरा गया। कुछ देर, सिर पकड़े स्वयं को सम्भालता रहा। “सूर्य, मुझे स्थिर करो, सहायता करो मेरी।”


सूर्य की उपासना प्राचीन काल से प्रचलित है। ऋग्वेद में द्रष्टा कहते हैं, ‘हम सूर्य की करते हैं उपासना, सूर्य जो हमारी दृष्टि है, जो प्रदान करते हैं सम्पदा, जो प्रदान करते हैं सुख।’


तब मुझे सूर्यवंश शिरोमणि राम का स्मरण आया। राम जो धर्म और मर्यादा के शिखर हैं। राम, जो सूर्य परम्परा के महानतम नायक हैं। राम, जो अंधेरे का नाश करके उजाले की स्थापना करते हैं।


तभी तो आदिकवि कहते हैं: जब तक अडिग हैं पर्वत, और नदियाँ हैं चलायमान; तब तक बनी रहेगी, राम कथा, जो है, प्रेम और सहस्तित्व के संदेश की वाहक।


राम सहज हैं, और उनको सब सहज है। सत का आदर्श ही राम का आदर्श है। राम निर्विकार हैं, राम निरपेक्ष हैं। राम जनता के नायक हैं, मर्यादित, समर्पित और प्रगतिशील। राम जन-जन को धर्म के पथ पर ले जाने वाले महानायक हैं। राम लोगों को और सभ्यताओं को जोड़ते हैं। राम पोंगापंथ के विनाशक है। राम सड़-गल चुकी मान्यताओं को मिटाकर नए पथ का सृजन करने वाले युग-निर्माता हैं।


राम समय की आत्मा हैं।


जब उठाया उसे राम ने

ऊँचा हुआ गर्वोन्नत भाल विश्वामित्र का।

जब मोड़ा उसे राम ने

झुक गए गर्वोंन्मत्त राजाओं के मस्तक।

जब टंकारी प्रत्यंचा राम ने

विभ्रम रेखा मिट गयी जनक के भाल से।

खींची जब राम ने प्रत्यंचा

आलोड़ित सीता का हृदय हुआ।

तोड़ा जब शिव धनु राम ने

टूट गया बीज परशुराम के वयोवृद्ध अहंकार का।


पर राम कथा? ऐसा कौन है, जिसने राम कथा नहीं सुनी है? लाखों किताबें लिखी गयीं हैं राम पर। तुम सा मंदमति, मूढ़ और अज्ञानी क्या लिखेगा राम के बारे में?


परंतु मन नहीं माना। विभ्रमों, चिंताओं, असहायता तथा अंधेरे के बीच तुलसीदास आशा की किरण बनते हैं।


सब जानत प्रभु प्रभुता सोई,

तदपि कहे बिनु रहा न कोई।


तब समझ आया कि राम कथा तो स्वांत: सुखाय ही कही जाती है। अपने स्वयं के अंधेरे और विभ्रमों के नाश के लिए।


अँधेरा हमें अंधा कर देता है। पर यह भी सत्य है, जैसा कि ओशो कहते हैं, विश्व की सारी कहानियाँ , अंधे आदमियों की जिज्ञासा से ही तो आरम्भ हुई हैं। गीता जैसा ग्रंथ भी अंधे धृतराष्ट्र के जिज्ञासा से आरम्भ होता है।


धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता यूयुत्सवा।

मामका: पांडवाशचैव किमक़ुर्वत सँजय ।।


गंगा के कोप की इस विभीषिका में राम ही मेरे मानसिक और शारीरिक अंधकार को हरने में सहायक होंगे। गंगा के क्रोध के बीच बैठा मैं सोचता रहा।


रामकथा की ही तरह, गंगा की प्रचंड विनाशकता कोई नवीन बात नहीं है। जब भगीरथ प्रयत्नों से उसे आकाश से उतरना पड़ा था और जब महायोगी शिव उसे अपनी जटाओं में बाँधने के लिए हो गए थे तैयार; तब आक्रोश भरी गंगा ने फूँफकारा था:


वह मुझे बांधेगा?

मेरी बाढ़ उसे बहा ले जाएगी।

मेरा उफनता ज्वार

उसे भँवरों में देगा डुबा

अनंत नरक की गहराइयों में…


पर शिव तो शिव हैं। यहाँ आसन्न मृत्यु का इंतज़ार करता मैं भी उन्हें याद करके, एक नए उत्साह से भर उठा। पर्वत सम्राट शिव ने मुझे निडर कर दिया।


हे शिव, मुझे आलोकित करो

इस उफनती नदी को नाचने दो,

मेरे भी सिर पर।

तुम्हारी कृश और उलझी जटाएँ,

ज़हरीले नाग मुझे ग्रस लें।

भूत, प्रेतों से घिरा मैं

शमशान की राख में लिपटा होकर भी-

यहीं बैठा रहूँगा

साधनारत शमशान में चिताओं के मध्य,

एक योगी की तरह।

हे शिव,

मुझे मुक्त करो

मैं नहीं चाहता पुनर्जन्म

परंतु, ले जाओ मुझे

सार्थकता के शिखर पर।

अहो प्रभु,

बने तुम्हारा पथ ही मेरा भी मार्ग।


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(Pages 1-21 show above.)