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Excerpt for घमंडी सियार व अन्य कहानियाँ (बालकथा संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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घमंडी सियार अन्य कहानियाँ
(बालकथा संग्रह)




लेखक
ओमप्रकाश क्षत्रियप्रकाश








ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश

09424079675 opkshatriya@gmailcom

जन्म दिनांक: 26 जनवरी 1965

शिक्षा: 5 विषय में एम , पत्रकारिता, कहानी-कला, लेख-रचना, फ़ीचर एजेंसी का संचालन में पत्रोपाधि


व्यवसाय: सहायक शिक्षक


लेखन: बालकहानी, लघुकथा, लेख कविता



उपलब्धि: 111 बालकहानियों का 8 भाषा में प्रकाशन अनेक कहानियां विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित




प्रकाशित पुस्तकें:

  • लेखकोपयोगी सूत्र 100 पत्रपत्रिकाएं (कहानी लेखन महा विद्यालय द्वारा प्रकाशित)

  • कुएं को बुखार

  • आसमानी आफत

  • कौन सा रंग अच्छा है?

  • कांव-कांव का भूत

  • बच्चों! सुनों कहानी

  • गुलदस्ता (लघुकथा संग्रह)


पुरस्कार:

  • इंद्रदेवसिंह इंद्र बालसाहित्य सम्मान-2017

  • स्वतंत्रता सैनानी ओंकारलाल शास्त्री सम्मान-2017

  • बालशौरि रेड्डी बालसाहित्य सम्मान- 2015

  • विकास खंड स्तरीय कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय 2017

  • लघुकथा में जयविजय सम्मान-2015 प्राप्त

  • काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान- 2017 प्राप्त

  • जनकपुर नेपाल में सृजन साहित्य सम्मान-२०१८ में प्राप्त












समर्पण



बच्चों की जिज्ञासाओं को बढ़ाने तथा

उनका मनोरंजन करने के

साथ-साथ ज्ञानवर्धन के लिखी गई

इन कहानियों में बच्चों के लिए

शिक्षाप्रद बातें भी हैं।



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बच्चों के लिए समर्पित

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अपनी बात



खुशियां जब मिलती हैं, तो मन को लुभाती है। ये हरेक चीज से मिल सकती है। किसी से मिलने पर खुशी मिलती है। कभी सम्मान मिलने पर हम इसे प्राप्त करते हैं। कभी पुस्तक छपने पर मन प्रफुल्लित हो जाता है। कभी कोई रिश्ता बन जाता है तो मन खुशियों से भर जाता है। ये सब खुशियां प्राप्ति करने के रास्ते हैं। जो जानेअनजाने हमें प्राप्त होते हैं।

बहुत अच्छा लगता है जब अच्छेअच्छे काम होते हैं। अच्छेअच्छे लोग मिलते हैं। उन से हम प्रेरित होते हैं। छोटीछोटी सफलताएं हमें लुभाती है। किसी की बधाई और शुभकामनाएं हमें प्रेरित करती है। यही सब बातें हमें खुशियों से भर देती है। बस? इन्हें प्राप्त करने की कला और इन्हें मनाने का मन होना चाहिए।

मेरा पहला पत्र जब सरिता में छपा तो मुझे बहुत बड़ी ख़ुशी मिली थी। उस के लिए मेरे गुरू डॉ महाराज कृष्ण जैनजी कहानी लेखन महाविद्यालय ने मुझे प्रेरित किया था। उन्हीं की प्रेरणा से मैं बहुत कुछ लिख कर छपा पाया हूं। मेरे कई लेख उन्हीं की प्रेरणा से अच्छीअच्छी पत्रिका में छपे हैं।

दूसरी प्रेरणा मुझे मेरे पिताश्री केषवराम क्षत्रियजी से मिली थी। आप जिंदादिल व खुशमिजाज इनसान थे। उन्हों ने मुझे मुसीबत में हंसना सीखाया है। कैसे मुसीबतों का सामना किया जाता है। माता श्रीमती सुशीलादेवी जी ने मेरे मन में हिम्मत का संचार किया है। वहीं मेरी जीवनसंगिनी श्रीमती गीता क्षत्रिय ने मुझे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से तनमनधन से सहयोग व सहारा दे कर सदा प्रेरित किया है।

मेरे पुत्र राहुल क्षत्रिय से मैं बहुत कुछ सीखा हूं। इसी ने मुझे फेसबुक और वाट्सएप्प से अवगत करवाया। उसी की बदौलत मैं फोटोशाप में बहुत कुछ काम कर पाया हूं। उसी ने पहलापहल मल्टीमीडिया मोबाइल मुझे उपहार में दिया था। मेरी पुत्री प्रियंका क्षत्रिय से मैं पूरी तन्मयता से काम करने और अपने को सुंदर व सुदृढ़ तरीके से रखने की प्रेरणा प्राप्त कर पाया हूं। मेरी पुत्रवधु दीपिका क्षत्रिय से जहां मैं धैर्य के साथ कार्य करने और काम को सुंदर, व्यवस्थित और मन लगा कर करने की बातें सीखा पाया हू।

मेंरे भाई साहब आदरणीय अरूणाकुमारजी ने पूरी लगन व हिम्मत से कार्य करने की प्रेरणा दी। वहीं छोटे भाई महेंद्रसिंह क्षत्रिय से जुझारीपन व सहयोग की भावना सीख कर जीवन में उतार पाया हूं।

इस लेखन यात्रा में अनेक विद्वानों से मेरा परिचय हुआ है। इन में सर्वश्री व आदरणीय दिल्लीप्रैस के परेशनाथजी, योगराज प्रभाकरजी , मधुदीपजी गुप्ता, राजकुमार जैन राजनजी, डा विमला भंडारीजी, किशोर कुमार श्रीवास्तवजी, अखंड गहमरीजी सहित अनेक रचनाकारों से मिला। इन से बहुत कुछ सीखा और प्रेरित हुआ हूं। इस संग्रह की प्रेरणा बालसाहित्यकार राजकुमार जैन राजनजी ने सलुंबर सम्मान समारोह में जाते वक्त दी थी। उसी की बदौलत यह संभव हो पाया है।

जानेअनजाने अनेक विद्वानों ने मुझे प्रेरित किया है। कई पत्रिकाओं ने नियमित छाप कर मेरा हौसला बुलंद किया है। शुभतारिका, नईदुनिया, चौथासंसार, दौनिक भास्कर, बालभारती, पराग, नंदन, चंपक, सरससलिल, सरिता, मुक्ता, जीवन संगीनी, समझझरोखा, हंसती दुनिया, लोटपोट, बालहंस, समाजकल्याण, जयविजय, साहत्यकुंज, वेबदुनिया, फीचर ऐजेंसी आदि अनेक पत्रपत्रिकाओं ने मुझे नियमित रूप प्रकाशित व प्रसारित किया है।

वर्जिन सहित्यपीठ प्रकाशन का विशेषतौर पर आभारी हूं। उन्हों ने मेरी बालकहानियों से प्रभावित हो कर इन का संग्रह निकालने का प्रस्ताव रखा। इन के प्रकाशन का दाइत्व ग्रहण किया है। यह पहली बार हुआ है कि किसी बालसाहित्यकार की कोई भी किताब का संग्रह प्रकाशकीय खर्च पर वर्तमानयुग में प्रका’शित हो रही हैं।

वैसे मेरी 110 से ज्यादा कहानियां 8 भाषा में प्रकाशित और प्रसारित हो चुकी है। एक कहानी की इ-पुस्तक यूरोप की कुमाम भाषा को पुनर्जीवित करने के लिए अनुदित हो कर अंतरर्जाल पर प्रकाशित व प्रसारित हो चुकी है। यह मेरे लिए सब से बड़ी खुशी की बात थी। मगर, सब से बड़ी खुशी की बात यह है कि मेरा यह कहानी संग्रह वर्जिन साहित्यपीठ से प्रकाशित हो रहा है।

इस के लिए मैं वर्जिन साहित्यपीठ का विशेषतौर पर आभारी हूं। इन्हों ने विशेष योजना चला कर नवोदित लेखकों को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। इन के द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की साजसाज्जा व संपादकीय का कार्य बहुत ही उम्दा व उच्चकोटि का होता है। यह बात मैं आप की प्रशंसा के लिए नहीं कह रहा हूं। यह आप की पुस्तकें देखने के बाद प्रमाणितकता के आधार पर कह रहा हूं।

इस संग्रह में संग्रहित सभी कहानियां मूल रूप से बच्चों के लिए समर्पित है। उन्हें ये कैसी लगी है? यह मैं जानना चाहूंगा ताकि मैं भविष्य में उसी अनुरूप कहानियां लिख सकूं। अत: बच्चों से अनुरोध करता हूं कि वे मुझे मोबाइल पर इस के बारे में जरूर बताएं।

आपका साथी

ओमप्रकाश क्षत्रियप्रकाश























अजीब अंत्याक्षरी



कमल और प्रियंका अपनी मम्मी के साथ मामा के गांव जा रहे थे। रेल में समय बीताने के लिए प्रियंका ने कहा, "चलो? हम अंत्याक्षरी खेलते हैं?’’

इस पर कमल बोला, "नहीं यार? अंत्याक्षरी क्या खेलना? इस में मजा नहीं आता है?’’

अभी कमल की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि प्रियंका ने कहा, ‘‘नहीं-नहीं भैया, हम अजीब तरह की अंत्याक्षरी खेलते हैं?’’ और अपनी आंख खुशी से मटका दीं।

मम्मी चुप बैठी थी, "कैसी अंत्याक्षरी?’’ उन्हों ने जानना चाहा।

तब प्रियंका बोली, "मैं एक गाना गाऊंगी और आप लोगों को उस गाने से संबंधित बीमारी बताना पड़ेगी ।’’

"क्या?’’ कमल चौंक पड़ा।

"जैसे मैं गाना गाती हूं, ’’ कहते हुए प्रियंका ने गाने की एक लाइन गुनगुना दी, ‘‘लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है।’’

इस पर कमल ने जवाब दिया, "बरसात।’’

"नहीं बाबा? यह उत्तर सही नहीं है, ’’ प्रियंका ने कहा, "यह तो इस का अर्थ है। मैं ने कहा था कि किसी बीमारी का नाम बताना है ।’’

उसे कुछ समझ में नहीं आया , "तू ही बता दें?’’

"बीमारी है दस्त।’’

"ओह? लगी आज सावन कि फिर झड़ी है। वाकई सही बात कही है, ’’ कमल को एक गाने की लाइन याद आ गई थी। वह गुनगुनाने लगा, "तुझे याद न मेरी आई, किसी से अब क्या कहना?’’

प्रियंका को इस का उत्तर याद था। उस ने झट से कहा, ‘‘याददाश्त कमजोर होना।’’

"सही है, ’’ मम्मी ने कहा। उन्हें भी इस अजीब अंत्याक्षरी में मजा आने लगा था। उन्हों ने दिमाग पर जोर डाला। फिर एक लाइन गुनगुना दी, "तुझ में रब दिखता है यारा। मैं क्या करूं?’’

कमल को उत्तर देने की जल्दी थी। वह बोला, "प्यार होना।’’

"किस से?’’ मम्मी ने पूछा तो कमल ने जवाब दिया, "कुदरत से।’’

इस पर प्रियंका बोली, "यह बीमारी नहीं है ।’’

तब तक मम्मी को जवाब याद आ गया था। मगर, वे कुछ नहीं बोली। जब किसी ने कोई जवाब नहीं दिया तब मम्मी ने बताया, "बीमारी - मोतियाबिंद।’’

"या फिर कम दिखना, ’’ प्रियंका ने कहा, "यह ठीक है।

"अब मैं गाऊंगी, ’’ कहते हुए प्रियंका ने अगले गाने का मुखड़ा दोहरा दिया, ‘‘हाय रे हाय? नींद नहीं आए।’’

इस पर कमल ने जवाब दिया, "अनिंद्रा।’’

"सही, ’’ मम्मी ने कहा, "बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया। जिगर में बड़ी आग है। इस का उत्तर बताइए?’’

"तड़फ।’’ कमल ने कहा।

"नहीं?’’ मम्मी बोली।

"अब, आप बताइए, ’’ प्रियंका थोड़ी देर बाद बोली तो मम्मी ने जवाब दिया, ‘‘एसीडिटी या फिर सीने में जलन।’’

"वाह मम्मी? मजा आ गया।’’

"अब मैं सुनाता हूं, ’’ कमल ने प्रियंका को रोकते हुए कहा, "सुहानी रात ढल चुकी है। न जाने तुम कब आओगे?’’

यह सुन कर कुछ देर तक सन्नाटा पसरा रहा। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। सब सोचने लगे। फिर अचानक प्रियंका ने जवाब दिया, "कब्ज।’’

"वाह , क्या जवाब है, ’’ पास ही बैठी एक लड़की ने कहा, ‘‘अब मैं सुना सकती हूं?’’ उस ने सभी से अनुमति मांगी।

"क्यों नहीं?’’ प्रियंका बोली, "आप का स्वागत है।’’

तब उस लड़की ने एक गाना गाया, "जिया धड़क धड़क जाए।’’

"उच्च रक्तचाप ।’’ कमल ने जवाब दिया और फिर एक मुखड़ा सुना दिया, "तड़फ तड़फ के इस दिल से आह निकलती है।

"इस का उत्तर बताइए।’’

यह सुन कर डिब्बे में कुछ देरी खामोशी रही। फिर मम्मी ने जवाब दिया, "हार्ट हटैक।’’

"सही है मम्मी, ’’ प्रियंका ने कहा , "अब मेरी बारी है।

"सुनाओ?’’

"जिया जले, जान जले, रात भर धुआं चले।’’

"बुखार, "कमल ने कहा, "अब तुम बताओ, ’’ कहते हुए उस ने एक गाने की लाइन सुना दी, "मेरा मन डोलें, मेरा तन डोले।’’

"इस का उत्तर आसान है। चक्कर आना।’’ पास वाली लड़की बोली तो मम्मी ने कहा, "बताना भी नहीं आता, छूपाना भी नहीं आता। इस का उत्तर बताइए।’’

सभी यह सुन कर खामोश रह गए। ऐसी कौनसी बीमारी है। जिसे बताना भी नहीं आता और छूपना भी नहीं आता है। मगर, उन्हें इस का उत्तर नहीं मिला। किसी ने कुछ जवाब दिया। किसी ने कुछ जवाब दिया। मगर, किसी का सही उत्तर नहीं था।

अंत में मम्मी ने कहा, "बवासीर।’’

इसे सुन कर सभी खुश हो गए।

पास में ही एक बुजुर्ग महिला बैठी थी। उसे भी मजा आ रहा था। वह बोली, "अब एक लाइन मैं सुना दूं?’’

"क्यों नहीं मांजी , ’’ मम्मी ने उन से कहा तो वे बोली, "टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई।

"अब इस का उत्तर बताइए?’’

सभी उत्तर सोचने लगे। तभी मम्मी ने जवाब दिया, "यूरिन इंफेक्शन।’’

‘‘सही है, ’’ प्रियंका ने कहा तभी कमल चिल्ला पड़ा, "मम्मी नीमच आ गया।’’

सभी का ध्यान बंट गया। उन्हे स्टेशन पर उतरना था। इसलिए सभी सामान संहालने लगे और मजेदार अंत्याक्षरी पर विराम लग गया।































वही गरम, वही ठंडा



राहुल को गांव आना अच्छा लगता था। इस का कारण यह था कि जब तक वह गांव में रहता तब तक शहर के शोरशराबे व भीड़भाड़ से बचा रहता था। इसलिए जब भी छुट्टी होती वह गांव चला आता।

"चलो राहुल? आज कुंए पर नहाने चलते हैं, ’’ मामाजी ने राहुल से दीपावली के दो दिन पहले कहा तो राहुल गांव की ठण्ड को याद कर के कांप गया।

"मामाजी? इस ठण्ड में, ’’ राहुल चकित था।

"हां, ’’

"ठण्ड में ठण्डे पानी से नहाना। ना बाबा ना। यह मेरे बस का काम नहीं है। मैं तो शहर में रोज गरम पानी से नहाता हूं।’’

"तो तुम गरम पानी से नहा लेना।’’ मामाजी ने कपड़े उठाए, कंधे पर रखे, "अब अपने कपड़े लो और चलो।’’

"आप कुंए में तैरोगे, मामाजी?’’

"हां, चलो।’’

राहुल को मामाजी ने पिछली गरमी में तैरना सीखाया था। वह भी कुंए में। वह पहले तो बहुत डरा था। मगर, जब मामाजी ने पैजामे का फूग्गा बना कर दिया तब उस का डर जाता रहा।

मामाजी ने पैजामें का जीवन रक्षक कवच बनाया था। पहले, पैजामे को पानी में गिला किया। उस की दोनों मौरी को सूतली से बांधा। ऊपर के नाड़े को खींच कर कपड़े पर नाड़ा लपेट दिया। फिर पानी में पैजामें को डाला। मुंह से पैजामे में हवा भरने लगे। कुछ ही देर में पैजामा गुब्बारे की तरह फूल गया।

उस पर मामाजी सो गए। "अब यह पानी में डूबेगा नहीं।’’ मामाजी ने कहा तो राहुल चकित रह गया। कपड़े का गुब्बारा। वह भी पानी में तैरता हुआ। जिस पर आदमी आराम से तैर सकता है। यह तो मामाजी का अनोखा आविष्कार है।

"सही में, यह पानी में नहीं डूबेगा?’’

"हां, ’’ मामाजी ने जवाब दिया, "हमारे यहां सभी इसी तरह के गुब्बारे से तैरना सीखते हैं, ’’ कहते हुए मामाजी ने गुब्बारे को अपनी दोनों बांहों के बीच फंसाया और तैरने लगे।

गुब्बारे की दोनों टांगे मामाजी की बगल से बाहर निकल रही थी। जैसे वह गुब्बारा हवा में कोई बाहर की ओर खींच रहा हो। इसी गुब्बारे पर राहुल ने तैरना सीखा था।

यह याद करते हुए वह मामाजी के साथ कुंए पर आ गया। मामाजी ने झट कपड़े खोले। पानी में कूद पड़े। ‘छपाक’ की आवाज हुई। मामाजी पानी के अंदर चले गए। फिर कुछ ही सैकण्ड में पानी के बाहर आ गए।

राहुल के हाथ अपने जैकेट की जेब में चले गए, "मामाजी? ठण्ड लग रही है?’’ उस ने मामाजी से जोर से चिल्ला कर पूछा।

"नहीं भानजे?’’ उधर से मामाजी ने चिल्ला कर उत्तर दिया, "कुंए के पानी में ठण्ड नहीं लगतीं । ’’

"क्यों भला?’’

"क्यों कि यह ठण्ड में गरम होता है।’’ मामाजी चिल्ला कर कह रहे थे, "चाहो तो पानी में हाथ डाल कर देख लो।’’

राहुल विज्ञान का विद्यार्थी था। उस ने कुंए में उतर कर पानी में हाथ डाला। पानी वाकई गरम था।

"हां, मामाजी, पानी तो गरम है, ’’ पानी में अपनी टांग को साइकल की तरह चला कर पानी में स्थिर खड़े मामाजी को देखते हुए राहुल ने कहा।

"तो आ जाओ पानी में, ’’ मामाजी ने हाथ हिलाया।

"आ जाऊ।’’ राहुल ने हिम्मत की।

"हांहां , आ जाओ।’’ मामाजी के प्रोत्साहित करते ही राहुल ने कपड़े खोले और कुंए के पानी में उतर गया, "मामाजी, वाकई पानी बहुत गरम है।’’

"मैं ने कहा था भानजे, तुम्हें गरम पानी में नहलाऊंगा।’’


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