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Excerpt for अवधपति! आ जाओ इक बार (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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अवधपति! जाओ इक बार
(काव्य संग्रह)








लेखक
अवधेश कुमारअवध













अवधेश कुमार विक्रम शाह

साहित्यिक नाम: 'अवध'

9862744237, 8787573644

awadhesh.gvil@gmail.com

पिता: स्व० शिवकुमार सिंह

माता: श्रीमती अतरवासी देवी

निवास: मैढ़ी, चन्दौली, उत्तर प्रदेश - 232104

आदर्श: संत कबीर, तुलसीदास, दिनकर निराला

शिक्षा: स्नातकोत्तर (हिन्दी अर्थशास्त्र), बी. एड., बी. टेक (सिविल), पत्रकारिता इलेक्ट्रीकल डिप्लोमा

व्यवसाय: सिविल इंजीनियर, मेघालय



प्रसारण:

  • ऑल इंडिया रेडियो द्वारा कावय पाठ व परिचर्चा

  • दूरदर्शन वाराणसी द्वारा काव्य पाठ

  • दूरदर्शन गुवाहाटी द्वारा साक्षात्कार

  • दूरदर्शन गुवाहाटी द्वारा काव्यपाठ



प्रभारी: नारायणी साहि० अकादमी, मेघालय

सदस्य: पूर्वासा हिन्दी अकादमी

संपादन: साहित्य धरोहर, पर्यावरण, सावन के झूले, कुंज निनाद आदि

साक्षात्कार: श्रीमती वाणी बरठाकुर विभा, श्रीमती पिंकी पारुथी, श्रीमती आभा दुबे एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा

शोधपरक लेख: पूर्वोत्तर में हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता

प्रकाशित साझा संग्रह: कवियों की मधुशाला, नूर ए ग़ज़ल, सखी साहित्य, कुंज निनाद आदि

सम्मान: विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा प्राप्त

प्रकाशन: विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत जारी

सृजन विधा: गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं

उद्देश्य:

  • रामराज्य की स्थापना हेतु जन जागरण

  • हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जन मानस में अनुराग व सम्मान जगाना

  • पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जन भाषा बनाना





तमस रात्रि को भेदकर, उगता है आदित्य |

सहित भाव जो भर सके, वही सत्य साहित्य ||

अवधेश कुमार 'अवध'











समर्पण



धर्म संस्थापक मर्यादा पुरुषोत्तम अवधपति भगवान श्रीराम के पंकज चरणों में रघुवंशी अवधेश कुमार ‘अवध’ आत्मज श्रीमती अतरवासी देवी एवं स्व0 शिवकुमार सिंह द्वारा सादर समर्पित।



























अवधपति!



भक्त की करुण पुकार सुनकर भक्तवत्सल परमपिता परमेश्वर हर युग में आए हैं, इसी अटूट विश्वास और अक्षय श्रद्धा से संतृप्त मानस भाव लेकर अवध पुकार रहा है अवधपति मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को। उस राम को जो भक्त की वांछित मनोकामना पूर्ति हेतु मानव ही नहीं अपितु पशु, पक्षी अथवा प्रकृति के रूप में भी अविलम्ब दौड़े चले आते हैं और आएँगे भी क्योंकि यह एक अबोध भक्त की पुकार है।

पुरातन धरोहर, वर्तमान यथार्थ एवं भविष्य की मंगल कामना से औरों की तरह मैं भी उद्वेलित होता हूँ जिसका परिणाम अवध द्वारा 'अवधपति' की पुकार है जो एकमात्र सहारा हैं।

सनातनी छंद यथा दोहा, चौपाई एवं सरसी छंद के समन्वय में भक्ति एवं दैन्य का भाव 'अवधपति' के भक्तगण को बेहद रुचिकर है जिनकी प्रतिपुष्टि मेरे लिए उत्साह वर्द्धक है। 108 चरणों में मेरी यह विनती काव्य - शिल्प एवं व्याकरण की सीमा का कदाचित आतिक्रमण कर रही हो तो आपको होने वाली असुविधा के लिए मैं अग्रिम क्षमा प्राथी हूँ।

मेरा उद्देश्य रामराज्य की स्थापना की दिशा में उपजे अवरोधों को दूर करने हेतु जन - जागरण करना है और इस हेतु सहयोगी एवं मार्गदर्शक के रूप में जगद्नियन्ता अवधपति भगवान श्रीराम को पुकारना है। उस अवधपति श्रीराम को जो शिव, श्याम, शक्ति, ब्रह्म, साधु, कर्मवीर, धर्म संस्थापक, अपौरुषेय एवं मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। इसका सृजन माँ शारदे की महती अनुकम्पा एवं 'अवधपति' की प्रेरणा से ही सम्भव हो सका है। मैं आत्मीय आभारी हूँ गुरुजनों के आशीष का,परिजनों के सानिध्य का, मित्रजनों के सहयोग का एवं सहकर्मियों के साहचर्य का। यही वह शक्ति है जिससे मैं हृदय में उमड़ते भावों को आप तक पहुँचाने की चेष्टा कर रहा हूँ। अगली श्रृंखला के रूप में "अवध सभी को रहा जगाय", "अवध लेखनी राज करेगी" तथा "अवधपति! आना होगा" शीघ्र प्रकाश्य है। आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि जब हम समवेत स्वर में 'अवधपति' को पुकारेंगे तो उनको आना ही पड़ेगा।

अवधेश कुमार 'अवध'



















अवधपति भक्तों के उद्गार



आपके साहित्य वीणा के तार इतने सधे हुए हैं कि हल्की से हल्की झँकार से भी अंतर्पट प्रतिध्वनित हो उठता है़। आपकी रचनाएँ जीवन - भाषा में सादगी का सौन्दर्य घोल कर सघन संवेदनीयता के साथ भावों को परिपूर्णता प्रदान करती हैं। आपने समाज के विभिन्न वर्गों की मानसिकता एवं जीवन - संघर्ष की परिस्थितियों को चित्रित करने का प्रयास किया है। सड़ चुके वर्तमान समाज की निराशाजनक स्थिति, अत्याचार से लड़ने की असमर्थता, बुद्धिजीवियों की विचारधारा की नपुंसकता एवं उच्च विचारधारा की कर्म में परिणति की असफलताओं का सार्थक चित्रण भी आपकी रचनाओं में देखने को मिलता है। आपकी रचनाएँ समय को साथ लेकर चलती हैं, समय के साथ जीती हैं, भावों में प्रवण - चेतना लहराती हैं। कविताएँ पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेट लेती हैं।

यह आपका अन्तःप्रकाश ही है जो आपके अन्दर व्याप्त सृजनशक्ति को, साधना की सम्पदा को साहित्य प्रेमियों के बीच प्रोत्साहना के साथ जगाने का कार्य कर रहा है। हमलोगों की साहित्यिक प्रतिभा को शब्दों के धरातल में सलीके से संजोने की क्षमता प्रदान कर रहा है, आपकी सृजना पढ़ने वालों की चेतना में घुल मिलकर उसकी मनोग्रंथियों को खोलता है।

आपका यह वृहद् कार्य हम सबों के मन में व्याप्त जटिल उलझनों को सुलझाने का प्रयास है, व्युत्पित संकटों का समाधान प्रस्तुत करना है। आपके प्रयत्नों की जितनी सराहना की जाये, कम है। हमारी शुभकामना स्वीकार करें।

प्रकाश चन्द्र बरनवाल, आसनसोल



आपकी ईश्वर से प्रार्थना मेरे मानस में नये भाव जगाती है। कभी मनुहार , कभी गुहार , कभी ललकार तो कभी पुकार जान पड़ती है। आज की सामाजिक विसंगतियों में इसकी परम आवश्यकता है। ऐसा ही हो।

अवधपति फिर से अवतार लें।

तथास्तु !

सुनीता लुल्ला









नीति प्रीति परमार्थ का, सार्थक सृजन विशेष।

लेखक पाठक पर सदा, कृपा करहिं अवधेश।।

आचार्य सन्तोष अवस्थी, अयोध्या (.प्र.)















अवधेश कुमार "अवध" द्वारा रचित यह काव्य ऋंखला आध्यात्मिक और भौतिक सोच को विकसित करने वाला काव्य है जो 108 बन्धो में प्रसारित है।इसमें कवि ने अपने हर बन्ध के समस्यात्मक कथ्य को दोहा से प्रारम्भ करके चौपाई में ढाला और "अवधपति" से उसके निवारण की विनती करते हुए उनका आह्वान सरसी छंद में निबद्ध किया जो बहुत ही कातर और मर्मस्पर्शी है।

सामाजिक, व्यक्तिगत और राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए हर बन्ध में 'अवधपति' का आह्वान इस काव्य को वैशिष्ट्य प्रदान करता है। तीन से अधिट छन्दों का एक साथ प्रयोग रचना को नव्यता प्रदान करता है।

सुशीला जोशी, मुजफ्फरनगर (. प्र.)





बहुत शानदार प्रयास, स्तुत्य भावना के साथ समृद्ध शब्द शिल्प में गूँथकर लिखा गया काव्य। आपको बधाई।

संदीप 'सरस', सीतापुर (उप्र)











व्यवहारकुशल, मृदुभाषी, भगवान श्री राम के प्रति असीम आस्था रखने वाले और समाज को राह दिखाने के लिए लगातार प्रयास करने वाले कुशल व्यक्तित्व के स्वामी श्री अवधेश कुमार "अवध" जी की इस कृति में प्रेम,करुणा और भक्तिभावों की अभिव्यक्ति हुई है जिनमें 108 पदों का शीर्षक "अवधपति ! आ जाओ इकबार" इसको प्रमाणित करता है।

आपकी कृति आज देश की मौजूदा परिस्थितियों में अत्यंत ही प्रासंगिक है। आज देश में जातीय घृणा-द्वेष विद्यमान है,ऐसे हालात में अवधपति से समाज में समरसता लाने के लिए लगाई गई गुहार,समाज के मुख्य स्तम्भ मानी जाने वाली नारियों और देश के भावी कर्णधारों के विकास के लिए चिन्तनशीलता आपके विशाल हृदय का परिचायक है।

आपकी कृति को पढ़ना समय से एकाकार होने के समान है।

ममता बनर्जी "मंजरी", गिरिडीह (झारखण्ड)





108 भाग की इस काव्य श्रंखला में शायद ही कोई ऐसा विषय हो जो रचनाकार की कलम से अछूता रहा हो ......अवधपति से विनती करते हुये रचनाकार ने जहाँ समता, समरसता, भाईचारा और एक नारी की विरह वेदना को प्रस्तुत किया है वहीं बचपन की लाचारी का भी बहुत ही सहजता से सार्थक चित्रण किया है। निश्चित रूप से "अवधपति आ जाओ इक बार " अपने आप में सम्पूर्णता लिए हुए एक अद्भुत काव्य कृति है.. ....और इसकी रचना के लिये अवध जी बधाई के पात्र हैं।

मंजु शाक्या, दिल्ली



यह अवध जी की नवीनतम, भक्ति एवम् जागरण की एक खूबसूरत काव्य श्रंखला है। आराध्य के आगमन की प्रतीक्षा और उस प्रतीक्षा में बैचेनी स्पष्ट दृष्टि गोचर होती है। चाहे वो सूर्य की आराधना की पंक्तियाँ हों या कैलाश वासी परम शिव को उद्बोधन हो। दीन दुःखी जन और पीड़ित का दर्द छलकता है तो उसी गहनता में भाव, शब्द भी पाते हैं। नारी अस्मिता और सामाजिक सरोकारों पर लेखनी चलाना, लेखक को सिद्ध है।

कृति सुधि पाठकों के मध्य अपना स्थान बनाएगी ये तय है।

जय हो ! विजय हो !!

ब्रजेश शर्मा विफल, झाँसी





वैसे तो प्रजातंत्र में रामराज्य की अवधारणा की कल्पना तो की गई किन्तु उसको मूल स्वरूप में अब तक जमीन पर स्थापित नहीं किया गया। कवि श्री अवध जी अपने काव्य में इसी पीड़ा को जन - जन तक लेकर चेतना और पुनर्स्थापन में पूर्णतः सफल हुए हैं.......आपकी यह कालजयी कृति दिशा एवं दशा परिवर्तन में नीव के रूप सदैव नामजयी के कर्मजयी बनेगी।

साँचा परिवर्तन लाना होगा,

अवधपति को आना होगा।

शुभेच्छाओं सहित

अवधेश अवस्थी, दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)



जीवन के हर पहलू को भाव और सुविचार के माध्यम से कवि ने प्रस्तुत किया है। मानव विवेक को जाग्रत करने तथा वर्तमान में घटित दैनंदिन हिंसा और दुर्घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया काव्य के जरिए देने की चेष्टा निश्चय ही अति प्रशंसनीय है। रामराज्य के सुखी एवं न्यायोचित राज्य प्रशासन एवं मूल्यबोध की आकांक्षा कवि को अवधपति का आह्वान करने को प्रेरित करती है। समाज और देश के लिए ऐसी रचनाएँ हर नागरिक को जागरूक करने के लिए आवश्यक हैं। आपसे भविष्य में बहुत आशाएँ हैं। बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ आपकी दीदी।

रुनू बरुवा "रागिनी" जोरहाट (असम)



रचनाकार ने भक्तिमय एवं शिक्षाप्रद पदों के माध्यम से देश में बढ़ते जा रहे अपराधों को रोकने के लिए अवधपति का आह्वान किया है जो काबिले तारीफ है।

रीता जयहिन्द, दिल्ली











इस मनोरम शृंखला के अधिकांश भाग मैंने पढ़े, सभी एक से बढ़कर एक हृदयग्राही हैं। सुषुप्त मानवीय चेतना को जाग्रत करती ,कवि धर्म का निर्वाह करती और वर्तमान सामाजिक समस्याओं का यथार्थ एवम् सजीव चित्रण प्रस्तुत करती हैं सभी रचनायें। समस्याओं के निवारण के लिये अति दैन्य और आर्त भाव से प्रार्थना की गई है "अवधपति आ जाओ एक बार।" सामाजिक हित में ऐसी करुण पुकार सुनकर अवधपति को आना ही होगा।

मीरा भार्गव 'वसुधा', कटनी (मध्यप्रदेश)

'अवधपति! जाओ इक बार' नामक काव्य खंड की रचयिता श्री अवधेश कुमार 'अवध' ने बड़े परिश्रम एवं लगन से भारतीय भक्ति, परम्परा एवं जनमानस को जाग्रत करने का काम बाखूबी किया है। इनकी भाषा और शैली प्रभावकारी है और ये कवि बधाई के पात्र हैं।

पवन कुमार सिंह, मेघालय













त्रेता युग में भगवान राम को देखने के लिए हनुमान जी ने बाल अवस्था से तप किया था।उसी तरह शबरी ने अपनी जीवन संध्या में मृत्यु को रोककर दशरथ नंदन को देखने के लिए उर में प्रभु मिलन की ज्योति जलाकर जिस तरह प्रतीक्षा की है, उसी तरह कलियुग में भूमंडल की स्थिति देखकर व्याकुलता से कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से वैश्विक पीड़ा को आवेदना के रूप में भगवान के सम्मुख रखने का प्रयास किया है।

जैसे कि -

सूनी सेज पुकारत नारी।

बाट जोहती अँखियाँ हारी।।...... पंक्तियों से मार्मिक संवेदनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है जो वर्तमान काल में ऐसे घटनाएं घट रही है जो बालिकाओं पर निर्ममता से अत्याचार हो रहा है।

और कवि के कलम से बाल मजदूरी व्यवस्था के प्रति भी प्रहार किया है एक चौपाई में कहते है -

कपड़े चिथड़े मुख पर चिंता।

बचपन कूड़ा करकट बिनता।।

अवधपति के सामने समस्याओं को उजागर करना ही नही समाधान ढूंढने की प्रवृत्ति सामान्य जनता में अंकुरित करने की चेष्टा कवि के कलम में है। और अवधान जी स्वभावतः श्रेष्ठ समीक्षक होने के नाते अनावश्यक ढांचा खड़ा नहीं किया। शुभ्र शिल्प कलेवर से रस गंभीरता से संलग्न हुई भक्ति एवं जागरण काव्य शृंखला जनरंजक होगी।

यह सत्य है ,सत्य ही शिव है ,शिव ही सुंदरम् है। कवि आ. अवध जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनायें-

अंततः हम सब कहते है "अवधपति आ जाओ इक बार"

श्रीमन्नारायणाचार्य "विराट", निजामाबाद (तेलंगाना)





आज समाज में नैतिकता का स्तर दिनोदिन गिरता जा रहा है। हमारी भावी पीढ़ी अपने पौराणिक और ऐतिहासिक ज्ञान से विमुख होती जा रही है। ऐसे मे आदरणीय अवधेश कुमार 'अवध' जी की

108 भागों में यह भक्ति एवं जागरण काव्य रचना पाठक के हृदय को आह्लादित करने में सक्षम होने के साथ-साथ समरसता का व्यवहार सिखाने में, सुप्तप्राय मानवीय गुणों को जगाने में एक रचनात्मक भूमिका का निर्वहन करने वाली है।

मंचों पर सुनियोजित नारे।

बच्चे फिर भी बने बिचारे।।

यूँ तो अवधेश जी के काव्य प्रतिभा के विषय में कुछ भी कहना मेरे लिए सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, परंतु इतना अवश्य कहूँगी कि आपकी रचनाओं की मैं कायल हूँ। माँ सरस्वती का वरदहस्त सदैव आप पर इसी प्रकार रहे और मेरे समान सभी आपके काव्य का रसपान करते रहें, आपका उद्देश्य, आपकी रचना का उद्देश्य निरापद पूर्ण हो इसी कामना के साथ।

मालती मिश्रा, दिल्ली





इस शृंखला में मुझे लग रहा है कि आपकी भक्ति अपने ईष्ट से अपने लिए कुछ नहीं बल्कि मानव मात्र के लिए, वर्तमान के दुःख दर्द दूर कर एक कल्पित सुखद समाज के लिए याचना कर रहा है और इसीलिए भक्ति उदात्त का उदात्त रूप दिखता है। किस ठौर जाऊँ, किसे कहूँ, कौन करेगा, कौन सुनेगा जैसी बेचैनियों से भरा आपका कवि मन जब हारिल की लकड़ी सरीखे अवधपति से नेहुरा करता है 'अवधपति!आ जाओ इक बार' तो उससे जन विवशताऔर कवि विश्वास साथ - साथ झलकता है जो आकर्षित करता है, एक भक्त को,एक पाठक को।

रचनाओं ने मन मोहा। हार्दिक बधाइयाँ।

अनिल कुमार झा, बिहार





रामराज्य की पुनर्स्थापना की दिशा में अवधेश कुमार 'अवध' जी कृत 'अवधपति आ जाओ इक बार' बेहद सार्थक प्रयास है। भारतीय संस्कृति में विश्वास रखने वाले लोग लगातार जुड़ रहे हैं इस जागरण अभियान से जिसमें मैं भी हूँ।

वाणी बरठाकुर 'विभा', तेजपुर (असम)









अभी कलयुग चल रहा है और भगवान राम के बताए अनुसार सत्य, न्याय संयम और ईमानदारी जैसी व्यवस्था का वर्चस्व न रहकर बेईमानी, झूठ असत्य और वासना का बोलबाला है। इन्हीं कुकर्मों को खत्म करने के लिए अवधपति श्रीराम से भक्तकवि अवध गुहार लगा रहे हैं। पूर्ण विश्वास है कि अवधपति को आना ही पड़ेगा।

डॉ. सुनीता अग्रवाल सौम्या, जोरहाट (असम)





. अवधेश जी का शब्द विन्यास इतना सरल एवं मर्मस्पर्शी है कि पाठक के हृदय तक गहरी पहुँच रखता है। उनकी आँखों में एक सुन्दर समाज का स्वप्न समाया हुआ है। मैं विनती करती हूँ कि अवधपति आएँ और रामराज्य के स्वप्न को साकार करें।

राधा गोयल

































1.

अवध जपो श्रीराम को, रहो कर्म में लीन ।

फल की आशा छोड़कर, चुन लो राह नवीन ।।

ईश ब्रह्म अवधेश कुमारा ।

जगत नियंता अगम अपारा ।।

धर्म हानि लख भू पर आये ।

असत अधर्म अशान्ति मिटाये ।।

असत असार जगत में केवल -

राम नाम आधार ।

अवधपति !

आ जाओ इक बार ।।



2.

सकल जगत इक मंच अरु, हम सब उसके पात्र ।

जैसा निर्धारित हुआ, वैसा करते मात्र ।।

हे ईश्वर भवसागर तारण ।

दूर करो सब बिपदा - कारण ।।

माया में है जग ये भटका ।

अंध कूप में उल्टा लटका ।।

सकल भुवन में अन्तहीन तम -

अब तो रस्सी डार ।

अवधपति !

आ जाओ इक बार ।।











3.

कर्म - नाव को ले चलें, जीवन - सागर बीच ।

धर्म - राह से नहिं डिगें, छोड़ दम्भ का कीच ।।

दो पाटों में जीव बिचारा ।

हर कोशिश कर करके हारा ।।


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