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Excerpt for Love Or Compromise by , available in its entirety at Smashwords

लव ओर कोम्प्रोमाईज़



© 2018 रबीउल इस्लाम

एडिटर श्रीकांत पांडेय







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ये कहानी लेखक की कल्पना है, नाम, पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना का उत्पाद हैं, इस कहानी को काल्पनिक रूप से ही पड़ी जानी चाहिए, किसी भी वास्तविक व्यक्ति, जीवित या मृत, घटनाओं, या स्थानीय लोगों के साथ इस कहानी का कोई ताल्लुक नहीं है।



Email id : irabiul853@gmail.com













































लेखक के बारे में दो शब्द,

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव "फारस पुर" के रहने वाले रबीउल इस्लाम, जो खुली आँखों में सपनें देखा करते थे, और अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए रबीउल ने क़लम उठाया, और अपने सपने को शब्द देकर "लव ओर कोम्प्रोमाईज़" के ज़रिए आप तक पहुँचाया, और आपने रबीउल के इस सपने के सफ़र को साकार करने का मौक़ा दिया, इसके लिए आभार।





























ख़ुदा ने हमें इतनी ख़ूबसूरत ज़िंदगी दी है, बदले में वो हमसे क्या मंगा है? ख़ुशियों से भारी हमारी ज़िंदगी, हम सदा ख़ुश रहें, हमारे ज़िंदगी में कभी ख़ुशियों की कमी न हो, माँ. बाप. भाई. बहन. और भी कई सारे रिश्ते प्रदान किये हैं उन्होंने हमें, उन रिश्तों के लिए हमारे दिल में सदा प्यार मुहब्बत हो, और वो प्यार मुहब्बत हमें एक दूसरे के साथ रखे, हम हमेशा-हमेशा के लिए एक दूसरों की सहारा बने रहें, यही चाहता है, और इसके लिए उन्होंने हमें संस्कृति के नाम पर इतनी ख़ूबसूरत तोहफा दिया है, हमें सिर्फ़ संस्कृति को साथ लेकर चलना है, और सच्ची ख़ुशी के क़रीब और साइंस के बनाये हुए नामली ख़ुशी से दूर रहना है।

एक बेटी, जब वो चार दिन की इस दुनिया में अति है तो उसे इस दुनिया के बारे में कुछ पता नहीं रहता है, उसे सिर्फ़ इतना पता रहता है कि हमें खेलकूद करना है और शाम को घर आकर माँ-बाप से डांट खाना है, और अगर ज़्यादा बदमाशियां करें तो माँ के हाथों से मार खाना है, इससे ज़्यादा उसे कुछ पता नहीं रहता है। फिर माँ धीरे-धीरे उसे इस दुनिया के बारे में बताती है, उसे संस्कृति देती है। फिर जब वो थोड़ी बड़ी हो जाती है तो उसे पता चलता है कि वो कुछ दिन के लिए अपने माँ-बाप के घर पर मेहमान है, एक दिन उसे अपने माँ-बाप को छोड़कर जाना है और दूसरों की घर बसाना है। और एक दिन वही होता है, सारे रिश्ते नाते. सारे बंधन छोड़कर उसे किसी अजनबी के साथ जाकर उसकी घर सजाना पड़ता है।

एक पत्नी, क्या चाहती है ज़िंदगी से? अपनी पिताः की तरह एक अच्छा पति, जो नेक हो, ईमानदार हो, मेहनती हो, और ये सारी खूबियां जिसकी पति के अंदर होते हैं उसकी पत्नी को ज़िंदगी से और कुछ नहीं चाहिए होते हैं, उसकी पति उसकी पिताः की तरह ईमानदारी से मेहनत करके अपने घर को चलता है, और पत्नी अपनी माँ की तरह, अपने बच्चों को संस्कार और संस्कृति देकर अपनी भविष्य को आगे बढ़ाते हैं, बाकायदा सारी ख़ुशियां भी उनकी परिवार में बरकरार रहता है।

लेकिन कभी-कभी ऐसा नहीं हो पाता है, पत्नी को दिखने में ख़ूबसूरत पति तो मिल जाते हैं, लेकिन अंदर से वो खोखले होते हैं, जिसका सबसे बड़ा कमी वो मेहनत करने से डरते हैं, अब सवाल ये है कि बिना मेहनत करके इनकम करने वाले ये इंसान कहाँ से आया है? ऑफिसली ये उन्हीं माँ-बाप का वंश है जिन माँ-बाप के पास संस्कृति की कमी है सभ्यता की कमी है ज्ञान की कमी है। और अब ऐसे इंसान के घर पर किस तरह का संस्कार बनेगा, उनकी घर की औरतों का क्या होगा? और उनके बच्चों के भविष्य क्या होगा?



और ऐसे बिना मेहनत कर के इनकम करने वाले मर्दों के दिमाग़ पर साइंस आज कल बड़ी आसानी से कब्जा कर रहे हैं, और कब्जा करने की सबसे पहली सीढ़ी होते हैं कि "हाऊ टू मेक मॉनी ऑनलाइन" साइंस की कही गई इस शब्द पर लोगों के कीमती समय बीत जाता है, पर इनकम नहीं होता है, बाकायदा बिना मेहनत किये पैसा कमाने की उस खोज में उल्टा पैसा भी खर्च हो जाता है, कभी वेबसाइट बनाने के लिए पैसा लेता है तो कभी वीडियो बनाने के लिए कहता है, इसमें साइंस की चीज़ों की पब्लिसिटी भी हो जाता है और साइंस का अच्छा खासा कमाई भी हो जाता है।



और रही बात औरोतों की, औरतों की दिमाग़ पर कब्जा करके तरक़्क़ी करने वाले साइंसों की इस दुनिया में इतिहास है। कहीं सेक्स फ्री के नाम पर औरतों से कंडोम की सेल्लिंग करके साइंस तरक़्क़ी कर रहे हैं, तो कहीं औरतों को उनकी सच्ची ख़ूबसूरती से दूर लेजाकर मेक अप. और नकली ख़ूबसूरती के नाम पर उसपर तरह-तरह के प्रोडक्ट सेल्लिंग कर रहे हैं, बेचारी औरत तो अभी भी इस बात से बेख़बर की साइंस अपनी तरक़्क़ी के लिए मुझे अपनी प्रोडक्ट सेल्लिंग मशीन बना दिया है।

और आज साइंस के बनाये हुए ऐसे कई सारे प्रोडक्ट औरतों के ज़रूरत बन गई है, जिसके बिना आज वो घर से बाहर नहीं निकल सकती है, और उन सभी प्रोडक्ट के लिए उन्हें पैसे की ज़रूरत है। और अगर उनके माँ-बाप भी "हाऊ तो मेक मॉनी ऑनलाइन" के चक्कर में पड़े हैं तो ज़ाहिर सी बात है उन्हें घर से पूरी तरह से मदद नहीं मिलने वाले हैं, और अपनी ज़रूरत की चीज़ों को खरीदने के लिए उसे जानबूझकर थोड़ा सा संस्कृति से भटक जाना है, और पैसा कमाने के घर से निकलना है।



और जब इंसान चंद रुपयों की महताज़ हो जाता है, तब आप सोच सकते हैं इंसान से किस तरह काम करवाया जा सकता है उसपर क्या-क्या बीतता है, उसे क्या क्या झेलना पड़ता है।


























































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